उज्जयिनी का बुद्धिपाल, जो अपने ज्ञान और साहस के लिए प्रसिद्ध था, एक रोज एक सिद्ध तांत्रिक 'शांतिकर' से मिला. तांत्रिक ने बुद्धिपाल से एक सिद्धि के लिए सहायता मांगी...
शांतिकर
"बुद्धिपाल! यदि तुम मेरा एक काम कर दो, तो मैं तुम्हें वह सब दे सकता हूँ जिसकी तुम इच्छा रखते हो. आज अमावस्या की रात, नगर के बाहर 'निर्जन वन' में जाओ. वहाँ एक विशाल वट वृक्ष (Banyan Tree) से एक शव (body) लटक रहा है. उसे मेरे पास लाओ. पर याद रहे, यह काम तुम्हें अकेले और मौन रह कर (bina bole) करना होगा."
बुद्धिपाल
(बुद्धिपाल निडर था. वह आधी रात को अकेले ही उस घने वन में पहुँच गया. उसने पेड़ पर चढ़कर तलवार से रस्सी काटी और उस शव को अपनी पीठ पर लाद लिया.)
बुद्धिपाल
(वह कुछ कदम ही चला था कि उसकी पीठ पर लदा वह शव ज़ोर से हँस पड़ा.)
पेड़ालाल
"हा-हा-हा! अरे वाह, बुद्धिपाल! मान गए तुम्हारी हिम्मत को. एक तांत्रिक के कहने पर मुझे, यानी पेड़ालाल को, अपनी पीठ पर ढो रहे हो?"
बुद्धिपाल
(बुद्धिपाल को तांत्रिक की 'मौन' रहने की शर्त याद थी. वह चुपचाप आगे बढ़ता रहा.)
पेड़ालाल
"ओहो! तो तुमने न बोलने का व्रत लिया है? खैर, रास्ता लंबा है और मैं बोर हो रहा हूँ. चलो, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ. कहानी सुनने के बाद मैं तुमसे एक पहेली (sawal) पूछूँगा."
पेड़ालाल
"अगर तुम्हें जवाब पता हुआ और तुम जानबूझकर चुप रहे, तो तुम्हारा सिर फटकर हज़ार टुकड़ों में बिखर जायेगा. और अगर तुम बोले... हा-हा-हा! तो मैं उड़कर वापस उसी पेड़ पर पहुँच जाऊँगा!"
कहानी 1: असली दानवीर कौन?
पेड़ालाल ने कहना शुरू किया, "सुनो! एक बार मगध राज्य में भयंकर अकाल (famine) पड़ा. लोग भूखे-प्यासे मरने लगे. उस नगर में तीन अमीर व्यक्ति रहते थे."
पहला था सेठ धर्मदास: वह बहुत अमीर व्यापारी था. उसने ढिंढोरा पिटवा दिया कि वह 10,000 सोने के सिक्के दान करेगा. उसने एक बड़ा 'भंडारा' खुलवाया, जिसके गेट पर उसका नाम बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था. लोग उसकी जय-जयकार करने लगे.
दूसरा था पंडित ज्ञानसागर: वह एक गरीब लेकिन बहुत ज्ञानी ब्राह्मण था. उसके पास पैसा नहीं था. पर वह सुबह से शाम तक जंगल जाता, खाने लायक जड़ी-बूटियाँ और कंद-मूल (roots) खोजता और लोगों को सिखाता कि अकाल में क्या खाकर जिंदा रहा जा सकता है.
तीसरा था एक गुमनाम किसान: उस किसान के पास बस एक बोरी अनाज बची थी. एक रात, उसने सुना कि उसका पड़ोसी, जिसके छोटे-छोटे बच्चे थे, भूख से तड़प रहा है. उस किसान ने अंधेरी रात में चुपके से अपनी वह आखिरी अनाज की बोरी अपने पड़ोसी के दरवाजे पर रख दी और वापस आ गया. उसने किसी को कुछ नहीं बताया.
पेड़ालाल ने अपनी बात खत्म की और हँस कर पूछा:
"बोल ए बुद्धिपाल! इन तीनों में से — सेठ धर्मदास, पंडित ज्ञानसागर, और वह गुमनाम किसान — असली दानवीर कौन था?"
बुद्धिपाल
(बुद्धिपाल धर्म-संकट में फँस गया. वह जानता था कि अगर वह चुप रहा, तो उसका सिर फट जाएगा क्योंकि उसे सही उत्तर पता था. और अगर वह बोला, तो उसका मौन व्रत टूट जाएगा. उसने बोलने का निश्चय किया.)
बुद्धिपाल
"रुको, पेड़ालाल! असली दानवीर वह गुमनाम किसान था."
बुद्धिपाल
"सेठ धर्मदास ने नाम कमाने के लिए दान दिया. पंडित ज्ञानसागर ने ज्ञान दिया, जो उत्तम था, पर उसमें उसका कुछ गया नहीं. लेकिन उस किसान ने अपना सब कुछ, जो उसके परिवार के लिए था, चुपचाप दान कर दिया, बिना किसी को बताये. असली त्याग वही था!"
पेड़ालाल
"हा-हा-हा! बिलकुल सही जवाब, बुद्धिपाल! बिलकुल सही... लेकिन तुम... बोल पड़े!"
बुद्धिपाल
(इससे पहले कि बुद्धिपाल कुछ समझ पाता, पेड़ालाल उसकी पीठ से हवा में उड़ा और ठहाके लगाता हुआ वापस उसी विशाल वट वृक्ष की ओर अँधेरे में गायब हो गया. बुद्धिपाल तांत्रिक की सिद्धि पूरी करने में असफल होकर, अकेला खड़ा रह गया.)
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